Saturday, August 8, 2009

तुम बिल्‍कुल हम जैसे निकले...

तुम बिल्‍कुल हम जैसे निकले
अब तक कहाँ छिपे थे भाई
वो मूरखता, वो घामड़पन
जिसमें हमने सदी गंवाई
आखिर पहुँची द्वार तुम्‍हारे
अरे बधाई, बहुत बधाई।
प्रेत धर्म का नाच रहा है
कायम हिंदू राज करोगे ?
सारे उल्‍टे काज करोगे !
अपना चमन ताराज़ करोगे !
तुम भी बैठे करोगे सोचा
पूरी है वैसी तैयारी
कौन है हिंदू, कौन नहीं है
तुम भी करोगे फ़तवे जारी
होगा कठिन वहाँ भी जीना
दाँतों आ जाएगा पसीना
जैसी तैसी कटा करेगी
वहाँ भी सब की साँस घुटेगी
माथे पर सिंदूर की रेखा
कुछ भी नहीं पड़ोस से सीखा!
क्‍या हमने दुर्दशा बनाई
कुछ भी तुमको नजर न आयी?
कल दुख से सोचा करती थी
सोच के बहुत हँसी आज आयी
तुम बिल्‍कुल हम जैसे निकले
हम दो कौम नहीं थे भाई।
मश्‍क करो तुम, आ जाएगा
उल्‍टे पाँव चलते जाना
ध्‍यान न मन में दूजा आए
बस पीछे ही नजर जमाना
भाड़ में जाए शिक्षा-विक्षा
अब जाहिलपन के गुन गाना।
आगे गड्ढा है यह मत देखो
लाओ वापस, गया ज़माना
एक जाप सा करते जाओ
बारम्बार यही दोहराओ
कैसा वीर महान था भारत
कैसा आलीशान था-भारत
फिर तुम लोग पहुँच जाओगे
बस परलोक पहुँच जाओगे
हम तो हैं पहले से वहाँ पर
तुम भी समय निकालते रहना
अब जिस नरक में जाओ वहाँ से
चिट्ठी-विठ्ठी डालते रहना।
-फ़हमीदा रियाज़

9 comments:

Rahul Gupta said...

bhai......bahut hi umdaa rachna hai..gaharaa swagat hai aapka

Unknown said...

achha anubhav hua...........

Anonymous said...

क्या कहना इस रचना का...
सीधे-साधे शब्दों और इशारों में कितने बडे़ खतरे का एक चित्र खींचती...
आईना दिखाती..

बेहतरीन...बहुत अच्छा लगा..

शशांक शुक्ला said...

बहुत सुंदर रचना है..

vallabh said...

हाँ...
तुम बिल्‍कुल हम जैसे निकले

Welcome...

दिगम्बर नासवा said...

KARAARA VYANG HAI ...LAJAWAAB....SWAGAT HAI AAPKA BLOG JAGAT MEIN

Meraj Ahmad said...

shuruat utsahjanak hai!yahi jazba baraqarar rahe.gazam ki kalpana hai.

rashmi ravija said...

बहुत ही सुन्दर रचना है ...आपने मेरे सिनेमा के अनुभवों पे कमेंट्स लिखे हैं,.शुक्रिया .मैंने एक अपना ब्लॉग बनाया...पहला प्रयास है....बताएं ,कैसा है?

Ek ziddi dhun said...

ise Muzaffarnagar men Fahmeeda ji ke munh se sunne ka mauka mila tha.Vartman Sahity ne ise ek ank men sampadeeky ke taur par chhapa tha