Tuesday, December 8, 2009

इलाही कोई हवा का झोंका

इलाही कोई हवा का झोंका दिखा दे चेहरा उड़ा के आंचल
जो झांकता भी है वो सितमगर तो खिड़कियों में लगा के आंचल

सुनी जो कदमों की मेरी आहट तो जाके चुपके से सो गए वो
जो मैंने तलवों में गुदगुदाया पलट दिया मुस्कुरा के आँचल

गुरुर ढाएगा कोई कितना ज़रूर महशर बपा करेगा
ये तेरा अठखेलियों से चलना झुका के गर्दन गिरा के आँचल

ज़ुरूर है माजरा ये कोई वो रहते हैं दूर-दूर हमसे
जो पास आकर भी बैठते हैं तो हर तरफ से दबा के आँचल