मेरा नाम अमरीश है ...और मुझे गाने सुनने का बेहद शौक है...गूगल मे इधर उधर घूमते हुए मुझे युनुस खान साहेब का ब्लॉग मिला, और भी कई हिन्दी ब्लॉग नज़र आए, तो मैंने भी सोचा की एक ब्लॉग बना लूँ...
आशा भोसले जयदेव और ग़ालिब की ये ग़ज़ल मुझे बहुत पसंद है :
कभी नेकी भी उसके जी में गर आ जाये है मुझसे
जफ़ायें करके अपनी याद शर्मा जाये है मुझसे
ख़ुदाया! ज़ज़्बा-ए-दिल की मगर तासीर उलटी है
कि जितना खेंचता हूँ और खिंचता जाये है मुझसे
वो बदख़ू और मेरी दास्ताने-इश्क़ तूलानी
इबारत मुख़्तसर, क़ासिद भी घबरा जाये है मुझसे
उधर वो बदगुमानी है, इधर ये नातवानी है
ना पूछा जाये है उससे, न बोला जाये है मुझसे
सँभलने दे मुझे ऐ नाउमीदी, क्या क़यामत है
कि दामाने-ख़याले यार छूटा जाये है मुझसे
तकल्लुफ़ बर तरफ़ नज़्ज़ारगी में भी सही, लेकिन
वो देखा जाये, कब ये ज़ुल्म देखा जाये है मुझसे
हुए हैं पाँव ही पहले नवर्द-ए-इश्क़ में ज़ख़्मी
न भागा जाये है मुझसे, न ठहरा जाये है मुझसे
क़यामत है कि होवे मुद्दई का हमसफ़र "ग़ालिब"
वो काफ़िर, जो ख़ुदा को भी न सौंपा जाये है मुझसे ।।
Sunday, December 7, 2008
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