मेरा नाम अमरीश है ...और मुझे गाने सुनने का बेहद शौक है...गूगल मे इधर उधर घूमते हुए मुझे युनुस खान साहेब का ब्लॉग मिला, और भी कई हिन्दी ब्लॉग नज़र आए, तो मैंने भी सोचा की एक ब्लॉग बना लूँ...
आशा भोसले जयदेव और ग़ालिब की ये ग़ज़ल मुझे बहुत पसंद है :
कभी नेकी भी उसके जी में गर आ जाये है मुझसे
जफ़ायें करके अपनी याद शर्मा जाये है मुझसे
ख़ुदाया! ज़ज़्बा-ए-दिल की मगर तासीर उलटी है
कि जितना खेंचता हूँ और खिंचता जाये है मुझसे
वो बदख़ू और मेरी दास्ताने-इश्क़ तूलानी
इबारत मुख़्तसर, क़ासिद भी घबरा जाये है मुझसे
उधर वो बदगुमानी है, इधर ये नातवानी है
ना पूछा जाये है उससे, न बोला जाये है मुझसे
सँभलने दे मुझे ऐ नाउमीदी, क्या क़यामत है
कि दामाने-ख़याले यार छूटा जाये है मुझसे
तकल्लुफ़ बर तरफ़ नज़्ज़ारगी में भी सही, लेकिन
वो देखा जाये, कब ये ज़ुल्म देखा जाये है मुझसे
हुए हैं पाँव ही पहले नवर्द-ए-इश्क़ में ज़ख़्मी
न भागा जाये है मुझसे, न ठहरा जाये है मुझसे
क़यामत है कि होवे मुद्दई का हमसफ़र "ग़ालिब"
वो काफ़िर, जो ख़ुदा को भी न सौंपा जाये है मुझसे ।।
Sunday, December 7, 2008
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3 comments:
इलाही कोई हवा का झोंका
दिखा दे चेहरा उड़ा के आंचल
जो झांकता भी है वो सितमगर
तो खिड़कियों में लगा के आंचल
सुनी जो कदमों की मेरी आहट
तो जाके चुपके से सो गए वो
जो मैंने तलवों में गुदगुदाया
पलट दिया मुस्कुरा के आँचल
गुरुर ढाएगा कोई कितना
ज़रूर महशर बपा करेगा
ये तेरा अठखेलियों से चलना
झुका के गर्दन गिरा के आँचल
ज़ुरूर है माजरा ये कोई
वो रहते हैं दूर-दूर हमसे
जो पास आकर भी बैठते हैं
तो हर तरफ से दबा के आँचल
गुलज़ार की दो कवितायें :
पुरानी दिल्ली की दोपहर
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लू से झुलसी दिल्ली की दोपहर में अक्सर
चारपाई बुनने वाला जब
घंटा घर वाले नुक्कड़ से, कान पे हाथ रख कर
इक हांक लगता था - ’चार पाई. बनवा लो...’
खसखस कि टट्यों में सोये लोग अन्दाज़ा लगा लेते थे.. डेढ़ बजा है..
दो बजते बजते जामुन वाला गुजरेगा
’जामुन.. ठन्डे.. काले जामुन’
न्यूयार्क
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तुम्हारे शहर में ए दोस्त
क्यूं कर च्युंटियों के घर नहीं हैं
कहीं भी चीटियां नहीं देखी मैने
अगरचे फ़र्श पे चीनी भी डाली
पर कोइ चीटीं नज़र नहीं आयी
हमारे गांव के घर में तो आटा डालते हैं गर
कई क़तार उनकी नज़र आये...
तुम्हारे शहर में गरचे
बहुत सब्ज़ा है, कितने खूबसूरत पेड़ हैं
पौधे हैं, फूलों से भरे हैं
कोई भंवरा मगर देखा नहीं भंवराये उन पर...
मेरा गांव बहुत पिछड़ा हुआ है
मेरे आंगन के बरगद पर
सुबह कितनी तरह के पंछी आते हैं
वे नालायक, वहीं खाते हैं दाना
और वहीं पर बीट करते हैं
तुम्हारे शहर में लेकिन
हर इक बिल्डिंग, इमारत खूबसूरत है, बुलन्द है
बहुत ही खूबसूरत लोग मिलते हैं
मगर ए दोस्त जाने क्यों
सभी तन्हा से लगते हैं...
तुम्हारे शहर में कुछ रोज़ रह लूं
तो बड़ा सुनसान लगता है...
Eight years ago !!
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